Thursday, 14 July 2016

उदारीकरण के दौर में मजदूर

जावेद अनीस

1991 से शुरू हुए आर्थिक सुधारों के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, इन 25 सालों के दौरान देश की जीडीपी तो खूब बढ़ी हैं और भारत दुनिया के दस बड़े अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है I आज जब “महाबली” चीन सहित दुनिया भर की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थायें मंदी की गिरफ्त में है तो भारत अभी भी अंधो में काना राजा” बना हुआ है I लेकिन दूसरी तरफ इस दौरान लोगों के बीच आर्थिक खाई बहुत व्यापक हुई है I साल 2000 में जहां एक प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल सम्पत्ति का 37 प्रतिशत था, वहीं 2014 में यह बढ़ का 70 प्रतिशत हो गया है, जिसका सीधा मतलब यह है कि इस मुल्क के 99 प्रतिशत नागिरकों के पास मात्र 30 प्रतिशत सम्पत्ति बची है I यह असमानता साल दर साल बढ़ती ही जा रही है I आर्थिक सुधारों से किसका विकास हो रहा हैं इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि मानव विकास सूचकांक के 185 देशों की सूची में हम 151वें स्थान पर पर बने हुए हैं I

किसी भी अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख घटक होते हैं पूँजी, राज्य व मजदूर, और अर्थव्यवस्था का माडल इस बात से तय होता है कि इन तीनों में से किसका वर्चस्व है I नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने जो नयी आर्थिक नीतियाँ लागू की थीं उसका मूल दर्शन यह है कि अर्थवयवस्था में राज्य की भूमिका सिकुड़ती जाए और इसे पूँजी व इसे नियंत्रित करने वाले सरमायेदारों के भरोसे छोड़ दिया जाए I इस वयवस्था के दो सबसे अहम मंत्र है निवेशऔर सुधार” I 25 साल पहले तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि सुधारोंका यह सिलसिला एक ऐसी धारा है, जिसके प्रवाह को मोड़ा नहीं जा सकता I आज लगभग सभी पार्टियाँ मनमोहन सिंह की इस बात को ही सही साबित करने में जुटी हुई हैं I

सामान्य तर्क ह कहता है कि वैश्वीकृत भारत में मजदूरों पर भी अंतर्राष्ट्रीय मानक लागू हों I जबकि उदारीकरणकारोबारी नियमों को आसान बनाने की मांग करता है I इसलिए भारत सरकार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुझाव दिए जाते हैं कि देश को कारोबार के लिहाज से “बेहतरबनाने के लिए उसे प्रशासनिक, नियामिक और श्रम सुधार करने होंगे और इस दिशा में आने वाली सभी अड़चनों को दूर करना होगा I नरसिंह राव से लेकर यूपीए-2 तक पिछली सभी सरकारें इसी के लिए प्रतिबद्ध रही है और सुधार व निवेश उनके एजेंडे पर रहा हैं I वे अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को सावर्जनिक क्षेत्र में ले आये हैं, नियमों को ढीला बना दिया गया है, तथा सेवा क्षेत्र का अनंत विस्तार हुआ है I लेकिन उदारीकरण के दुसरे चरण में इसके पैरोकार मनमोहन सिंह की खिचड़ी और थकी सरकार से निराश थे और उन्हें मनमोहन सिंह के एक नए संस्करण की तलाश थी जो उन्हें उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी में दिखाई पड़ रहा था I

workers tarring road
सड़क निर्माण मज़दूर 

2014 ने नरेंद्र मोदी को वह मौका दे दिया कि वे इन उम्मीदों को पूरा कर सकें I अब जबकि उनकी स्पष्ट बहुमत की सरकार है तो राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निगम और उनके पैरोकार यह उम्मीद कर रहे हैं कि मोदी सरकार उदारीकरण की प्रक्रिया में गति लाये और श्रम सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाये I श्रम कानूनों में सुधार को लेकर उनका तर्क है कि मौजूदा श्रम कानून कंपनियों के खिलाफ हैं और नई नौकरियों में बाधक हैं इसलिए निवेश बढ़ाने व ज्यादा नौकरियां पैदा करने के लिये लिए श्रम कानूनों को शिथिल करना जरूरी है I इसको लेकर मोदी सरकार भी बहुत उत्साहित दिखाई पड़ रही है तभी तो राज काज संभालने के दो महीने के भीतर ही केंद्रीय कैबिनेट ने श्रम क़ानूनों में 54 संशोधन प्रस्तावित कर दिए थे I हमारे देश में करीब 44 श्रम संबंधित कानून हैं I सरकार इनको चार कानूनों में एकीकृत करना चाहती हैं I प्रस्तावित बदलाओं से न्यूनतम मेहनताना और कार्य समयावधि सीमा हट जायेगी, “हायरऔर फायरके नियम आसन हो जायेंगें श्रमिकों के लिए यूनियन बनाना और बंद या हड़ताल बुलाना मुश्किल हो जाएगा I

राज्यों में में श्रम सुधार

जयपुर के नगीना उद्योग के मज़दूर 
पिछले दो सालों में मोदी सरकार के श्रम कानून में सुधार के प्रयासों को श्रमिक संगठनों से कड़ा विरोध झेलना पड़ी है I ट्रेड यूनियनों का कहना है कि यह एकतरफा बदलाव है I इनसे मालिकों को ज्यादा अधिकार मिल जायेंगे और उनके लिए कर्मचारियों की छंटनी करना और काम के घंटे बढ़ाना आसन हो जाएगा I एक तरफ ट्रेड यूनियन विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरह राज्य सभा में सरकार को बहुमत नहीं है, शायद इसीलिए सत्ताधारी पार्टी ने एक दूसरा रास्ता निकला है और राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश महाराष्ट्र जैसे भाजपा शासित राज्यों में में इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है I

राजस्थान : सुधारों की प्रयोगशाला !

राजस्थान तो जैसे इन तथाकथित सुधारों की प्रयोगशाला के तौर पर उभरा है I राजस्थान विधानसभा ने जो औद्योगिक विवाद (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2014, ठेका श्रम (विनियमन और उत्पादन) राजस्थान संशोधन विधेयक, कारखाना (राजस्थान संशोधन) विधेयक और प्रशिक्षु अधिनियम पारित किया है, जिसके बाद अब कंपनियाँ मजदूरों को नौकरी से निकालने के मामले में और भी बेलगाम हो जायेगीं, 100 के जगह पर अब 300 कर्मचारियों तक के कारखानो को बंद करने के लिए सरकार से अनुमति की बाध्यता रह गई है, इसी तरह से ठेका मज़दूर कानून भी अब मौजुदा 20 श्रमिकों के स्थान पर 50 कर्मचारियों पर लागू होगा इसका अर्थ यह है कि कोई कंपनी अगर 49 मजदूरों को ठेके पर रखती है तो उन मजदूरों के प्रति उसकी किसी प्रकार की जबावदेही नहीं होगी I पहले एक कारखाने में किसी यूनियन के रूप में मान्यता के लिए 15 प्रतिशत सदस्य संख्या जरूरी थी लेकिन इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है इसका अर्थ यह होगा कि मजदूरों के लिए अब यूनियन बनाकर मान्यता प्राप्त करना मुश्किल हो गया है I इससे नियोक्ताओं को यह अवसर मिलेगा कि वे अपनी पंसदीदा यूनियनो को ही बढावा दें I


गुजरात : हड़ताल पर समझौता शुल्क

सितंबर, 2015 में राष्ट्रपति द्वारा गुजरात सरकार के श्रम कानून संशोधन अधिनियम 2015 को स्वीकृति कर दिया गया है I इस अधिनियम के कुछ उपबंध केंद्र सरकार के श्रम कानून अधिनियम के उपबंधों के विरुद्ध थे,  इसी कारण इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता पड़ी I अधिनियम में मजदूरों एवं मालिकों के बीच होने वाले विवादों को अदालतों से बाहर सुलझाने पर बल दिया गया है I  इसी तरह से यदि श्रमिक श्रम आयुक्त को सूचना दिए बिना हड़ताल पर जाते हैं तो उनके ऊपर 150 रुपये प्रति दिन के हिसाब से समझौता शुल्क लगाया जा सकेगा जो अधिकतम 3000 तक है I यह सरकार को “जनपयोगी सेवाओं” में हड़ताल पर एक बार में 1 वर्ष तक प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है I अधिनियम मालिकों को बिना पूर्व सूचना के श्रमिकों के कार्य में परिवर्तन का अधिकार भी देता है I

मध्यप्रदेश महाराष्ट्र

22
जुलाई 2015 को मध्यप्रदेश विधानसभा ने 15 केन्द्रीय श्रम कानून के प्रावधानों को उदारएवं सरलबनाते हुए मध्यप्रदेश श्रम कानून (संशोधन) एवं विविध प्रावधान विधेयक-2015” पारित किया है, जिसे राष्ट्रपति की सहमति के लिए केन्द्र भेजा गया है I महाराष्ट्र में भी इसी तरह केसुधारकी तैयारी की जा रही है I महाराष्ट्र के श्रम विभाग ने वही संशोधन प्रस्तावित किये हैं जो राजस्थान सरकार ने लागु किये हैं इन बदलावों से राज्य की 95 % औद्योगिक इकाइयों को सरकार की मंजूरी के बगैर अपने कर्मचारियों की छंटनी करने या इकाई को बंद करने की छूट मिल जायेगी I

सम्मानजनक रोजगार की आशा समाप्त !

इन तथाकथित सुधारोंसे लम्बे संघर्षों के बाद मजदूरों को सीमित अधिकारों को भी खत्म किया जा रहा है I यह इरादतन किया जा रहा है ताकि नियोक्ताओं व कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुचाया जा सके I हालांकि इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि इससे रोजगार में वृद्धि होगी जिसका मतलब यह है अब सरकार के लिए रोजगार का मतलब सम्मानजनक जीवन जीने लायक रोजगार से नहीं रह गया है I

हमारे देश में कामगारों का अधिकतर हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है I राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के अनुसार वर्ष 2009-10 में भारत में कुल 46.5 करोड़ कामगार थे I इसमें मात्र 2.8 करोड़ (छह प्रतिशत) ही संगठित क्षेत्र में कार्यरत थे तथा बाकी 43.7 करोड़ यानी 97.2 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में कार्यरत थे I असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे अधिकतर कामगारों की स्थिति खराब है I वे न्यूनतम मजदूरी और सुविधाओं के साथ काम कर रहे हैं और सामाजिक सुरक्षा के लाभ से महरूम हैं I एनएसएसओ के 68वें चरण के सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2011-12 में भारत में करीब 68 फीसदी कामगारों के पास न तो लिखित नौकरी का अनुबंध था और न ही उन्हें सवेतन अवकाश दिया जाता था I इसी तरह से ज्यादातर असंगठित श्रमिक ट्रेड यूनियन के दायरे से बाहर हैं I उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार 87 फीसदी कामगार किसी संगठन या यूनियन से नहीं जुड़े थे I

मजदूरों के लिए अनुदार

भूमंडलीकरण के इस दौर में पूँजी अपने निवेश के लिए ऐसे स्थानों के तलाश में रहती है जहाँ श्रम और अन्य सुविधायें सस्ती हों I हमारे देश में लोग इतने मजबूर हैं कि वे कम मजदूरी और गैर-मानवीय हालातों में काम करने को तैयार हैं I इसलिए भारत को असीमित  मुनाफा कमाने के लिए एक आदर्श देश के रूप में प्रचारित किया जा रहा है I श्रम सुधारों के लिए 2016 और इसके बाद मोदी सरकार के बचे दो साल बहुत अहम होने जा रहे हैं I मेक इन इंडियाअभियान की शुरुआत जोर शोर से हो चुकी है और प्रधान मंत्री इसे दुनिया के कई देशों प्रचारित कर चुके हैं I स्वाभाविक रूप से सरकार का अगला कदम श्रम सुधारों की गति को तेज करना होगा I


निश्चित रूप से उदारीकरण का यह दौर मजदूरों के लिए अनुदार है और उनके लिए परिस्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं I


जावेद अनीस भोपाल में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता हैं व सामाजिक, आर्थिक तथा  राजनैतिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं I उनसे javed4media@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है  

फोटो - 
सड़क निर्माण मज़दूर - http://www.stockpicturesforeveryone.com/  से 
जयपुर नगीना मज़दूर - नेसार अहमद 
मेक इन इंडिया लोगो - मेक इन इंडिया वैबसाइट से 

Thursday, 19 November 2015

रिसर्जेंट राजस्थान – आशा और चिंताएं

नेसार अहमद



वाइब्रेन्ट गुजरातप्रोग्रेसिव पंजाबरिसर्जेंट राजस्थानइमर्जींग केरलाइन्वेस्ट कर्नाटका......

भारतीय राज्यों में देशी विदेशी निवेशकों को अपने यहां निवेश करने के लिये आकर्षित करने की होड़ मची हुई है। राजस्थान की भाजपा सरकार भी इस मामले में पीछे नहीं रहना चाहती है। अपने लगभग दो साल के शासन काल में राजस्थान सरकार ने राज्य में उद्योगों के समर्थन में कई नीतियां तथा कानुन बनाकर राज्य में निवेष के अनुकूल वातावरण बनाये जाने का स्पष्ट सकेत दिया है। यही नहीं मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद् में कई उद्योगपतीयों को जगह देकर उन्हें राज्य के नीतिगत मामलों को सीधे प्रभावित करने का मौका भी दिया गया है।

Sunday, 1 November 2015

Politics of Privatisation and PPP in Rajasthan: What are the risks?

Nesar Ahmad

Recent policy developments in the state

The BJP government in last almost two years has brought in some very interesting policy and legislative changes in Rajasthan. Let us have a look at some of the recent policy and legal changes in the state of Rajasthan. Below is a summary of some of the recent developments:

First changing the central labour laws in the state to make it easier for the industries to retrench the workers, make it more difficult for the workers to unionize and removing the compulsion to implement the Factories Act for most of the industries.

Then bringing a bill for not implementing the 2013 Act on land acquisition and rehabilitation and resettlement in the state and fast acquisition of land of the farmers without their consent and without the social impact assessment, which is now put on hold but can be again brought in any time. Beside, the state government has also passed its own Special Economic Zone Act.

Then bringing a draft policy for introducing PPP in secondary schools and efforts to give the select schools to the private sector.

Then a decision by the cabinet to hand over 90 primary health centres (PHCs) to the private players and later handing 300 PHCs and one Community Health Centre (CHC) to the private companies.

Handing the anganwadi centres to the private companies as Nand ghars.

Friday, 4 September 2015

भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की नाकाम कोशिश: किसानों व आदिवासीयों की जीत

नेसार अहमद

पिछले 30 वर्षो में पहली बार लोकसभा में पुर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा सरकार को संसद के भीतर और बाहर भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर मुंह की खानी पड़ी। सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने 2013 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा पारित भूमि अधिग्रहण, पुनःस्थापन एवं पुनर्वास में उचित मुआवज़ा तथा पारदर्शिता का अधिकार कानून 2013 को देश की आर्थिक विकास में सब से बड़ी रूकावट मानते हुए इसे बदलने के लिये एक अध्यादेश जारी किया था। इस अध्यादेश के द्वारा केन्द्र द्वारा पिछले वर्ष ही पारित इस कानून के सभी महत्वपूर्ण प्रावधानों को हटा दिया गया। परन्तु अध्यादेश तो 6 माह के लिये ही होता है और इसे स्थाई बनाने के लिये संसद में पास करवाना होता है।

Tuesday, 18 August 2015

Assam Flood: How ‘Development’ is leading the march towards catastrophe



Abdul Kalam Azad

Assam is one of the most flood prone states in North-Eastern states of India. Flood has almost become an annual event in Assam creating mayhem among the masses. Except two the hill districts of Karbi Anglong and North Cachar Hills, all the plain districts of both Brahmaputra and Barak Valley of Assam are vulnerable to floods in every monsoon starting from May/June to September/October. The flood water causes huge damage to crops, lives and properties (Mandal, 2010). As far as scale is concerned, the annual flood water from river Brahmaputra and its 28 northern and 18 southern tributaries and river Barak affects three-fourth of the total number of districts in the state (Phukan, 2005).  In 2012, Indian Space Research Organization carried out a study through satellite and remote sensing for extraction of flood disaster food print and assessing the disaster impact in Assam. The study shows that about 4.65 lakh ha area was submerged, 23 of the 27 districts in Assam had more than 5% of the total geographical area submerged, about 3829 villages marooned and 23.08 lakh people were affected (C. M. Bhatt, G. Srinivasa Rao, Asiya Begum, P. Manjusree, S. V. S. P. Sharma,L. Prasanna and V. Bhanumurthy, 2013)


Wednesday, 17 June 2015

Turning its back to the basic responsibilities by the state government

Proposed Privatization of Health and Education services in Rajasthan: 
Turning its back to the basic responsibilities by the state government

Nesar Ahmad

The Rajasthan government seems to be taking the privatization route of health, education and social services in full swing and it’s in continuation of the pro-private sector policies like changes in labour laws, attempts to bring state specific land acquisition bill, and promoting Public Private Partnership (PPP) in all areas. Yesterday the state cabinet took a decision to hand over the primary health centres (PHCs) to the private players in the name of adopting public private partnership (PPP) mode. The government has assured that even when privatizing the PHCs the government run schemes including free medicine and diagnosis, immunization, 104 and 108 ambulances will continue to run. In the first phase 90 PHCs, where medical and non medical staffs are not available as per standards, out of total 2082 PHCs are to be run under PPP mode.

Though the other details of introducing PPP in running the PHCs are yet to be known, the government of Rajasthan has already come out with a draft “Policy for Public Private Partnership (PPP) in School Education 2015” which proposes to open the door for private participation in school education in the state. The rationale behind this shocking proposal is “Despite increased state expenditure in education sector, quality of education in government schools has been deteriorating in compared to private schools.”  The draft policy document claims that there is “better learning outcome in private schools despite lower per student expenditure”. 

Saturday, 11 April 2015

पंचायत में नारी : पंचायती राज संस्थाओं में महिला आरक्षण के प्रभाव



मैं लडूंगी, जीतूंगी और आगे बढूंगी
जावेद अनीस
 “इस बार सरपंच पद अनारक्षित महिला वर्ग का है, कई उम्मीदवार होंगें, मैं भी एक उम्मीदवार हूँ, मैं आपके बीच की ही एक सामान्य नागरिक हूँ, ना मेरे पास धनबल है, ना बाहुबल और ना ही राजनीतिक छल, बस मेरे पास तो आपका जनबल है जिसके विश्वास से मैंने चुनाव में उतरने का फैसला किया है उपरोक्त मजमून हाल ही में संपन्न मध्यप्रदेश पंचायत चुनाव में भागीदारी कर रही श्रीमती पदमावती के चुनावी पर्चे का है, एक पेज के इस पर्चे में आगे उन्होंने कई चुनावी वायदे भी किये हैं जिसमें आवासीय पट्टे,राशन की दूकान,गरीबी रेखा,सामजिक सुरक्षा पेंशन में नाम जुड़वाने,आगंनबाडी, सौ दिन का रोजगार और शौचालय जैसे जमीने से जुड़े और वास्तविक मुद्दे शामिल हैं

महिला जनप्रतिनिधियों से साथ दशकों से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता इस बात की तस्दीक करते हैं कि जहाँ भी महिलाओं को पुरुषों के प्रभाव के बिना चुनाव लड़ने का मौका मिलता हैं वहां वे इसी तरह से लोगों के जीवन से जुड़े मुद्दों को अपना चुनावी एजेंडा बनाने का प्रयास करती हैं।

Wednesday, 18 March 2015

Unutilised SEZ Land: Forcible Land Acquisition for What!



 Nesar Ahmad 

As the opposition to the bill proposing amendments in the Land Acquisition and Rehabilitation and Resettlement Act 2013 intensifies within and outside of the Parliament, the government has provided data on unutilised land acquired for SEZ in 20 states of the country. 

A major argument made by the government and supporters of the corporate led growth in favour of the bill amending the Land Acquisition and Rehabilitation and Resettlement Act 2013 is unavailability of land for the industrialization. The data provided by the government in an answer to a Rajya Sbaha question about the land acquired and used for the Special Economic Zones, however, is telling another story. Sometime ago in its report on SEZ lands, CAG also found not only cases of land acquired for SEZ being vacant, but also being diverted to other uses like real estate and not adhering to the conditions like generating employment. 

Friday, 6 March 2015

Not a good sign for ‘resurgent’ India



Declining trends in quality of learning in elementary schools of rural India

Zakaria Siddiqui
 
In hustle bustle of ‘big’ political dramas like Budget, Elections, and the rise of communally motivated attacks we often forget our future generation. Every year during this time Annual Status of Education Report (ASER) Centre reminds us about status of education of our children. ASER 2014 released in January 2015 highlights that infrastructure gaps in schools have been closing successfully and India has achieved near universal enrollment (96%). This is a good news as it took many years for us to eventually reach that stage and now attention can now more fully be given to quality of learning.  ASER’s report once again highlights that children are not learning well in schools. In fact quality of learning has dwindled over time.

Tuesday, 24 February 2015

Emotional or Pragmatic!



Why people do not want to give up land (despite wanting to quit farming)?


Nesar Ahmad


The question of land is not emotional one as suggested by some economists who try to make the case for easy land acquisition. They suggest that the land is required for industrial and infrastructural development and if there is a tougher land acquisition act it will constrain the development and hinder progress of the country. They also say that many many more people are stuck in the unproductive and low paying agriculture sector (which is factually true) and its keeping them poor and backward.  Therefore, thus the argument goes, it is necessary to take the land from the people, even without their consent, for the development of industry and infrastructure, which will also help the poor people dependent on agriculture by moving them out of agriculture. All these arguments have been summarized here by R Jagannathan, a votary of free market economic policies and an ardent supporter of the Prime Minister Modi and his so called Modinomics.


However, the land question is far from emotional. It is a known fact now that a vast majority of farmers want to quit farming as farming is hardly economically viable. The crisis in agriculture has taken form of catastrophe in the last 2 and half decades, forcing thousands of farmers to commit suicide year after year. Still if the farmers remain in farming there must be some reasons which are far stronger than emotional.


Wednesday, 18 February 2015

विश्व स्तर पर तेज हो रही विकास की बहस

 भारत डोगरा

विश्व विकास की दृष्टि से वर्ष 2015 का एक विशिष्ट महत्त्व है। यह वर्ष सन् 2000 में तय किए गए मिलेनियम विकास लक्ष्य प्राप्त करने का अंतिम वर्ष है। सहस्राब्दी के आरंभ होने पर सितंबर 2000 में मिलेनियम महासम्मेलन का आयोजन किया गया था। इसमें विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आठ सहस्राब्दी उद्देश्य निर्धारित किए गए थे व इसके साथ 20 लक्ष्य निर्धारित किए गए कि मातृ मृत्यु दर, बाल मृत्यु दर, गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या वर्ष 2015 तक कितनी कम होगी। लगभग 15 वर्षों तक विश्व स्तर पर विकास के विभिन्न मंचों पर यह लक्ष्य ही छाए रहे हैं। इन्हें विकास का प्रमुख मानदंड मान लिया गया। इस समय एक ओर तो विश्व स्तर पर आकलन चल रहा है कि विभिन्न देशों में व विश्व स्तर पर यह उद्देश्य कहा तक प्राप्त हुए, जबकि दूसरी ओर वर्ष 2015 के बाद का एजेंडा क्या होगा इस पर बहुत बातचीत चल रही है।

इसके साथ ही यह सवाल उठने शुरू हुए हैं कि आखिर वर्ष 2000 में मिलेनियम उद्देश्य व लक्ष्य किस आधार पर तय किए गए थे। क्या इसके लिए निर्धन व विकासशील देशों में पर्याप्त जन-विमर्श हुआ था, या यह धनी देशों व चंद अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने ऊपर से लाद दिए थे? क्या इस तरह का प्रयास आगे भी होगा? यह सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि चंद धनी देशों ने एक ऐसा माहौल बनाया है जिनसे ऐसा प्रतीत हो कि वे दुनिया के गरीब लोगों का दुख-दर्द कम करने के लिए सबसे बड़ा योगदान दे रहे हैं, जबकि हकीकत इसके विपरीत है। यदि इसका पूरा हिसाब लगाया जाए कि विभिन्न स्रोतों से कितना पैसा वैध-अवैध तरीकों से गरीब व विकासशील देशों से धनी देशों में जा रहा है, तो यह राशि बहुत बड़ी है। धनी देश सब स्रोतों से जितनी विदेशी सहायता देते हैं, वह इस राशि का बहुत कम प्रतिशत है। इस तरह जहां व्यापार व पेटेंट के अनुचित नियमों, टैक्स से बचने के अनुचित तौर-तरीके, टैक्स हैवनों के अनुचित संचालन आदि विविध तौर-तरीकों से धनी देश जितनी अन्यायपूर्ण कमाई निर्धन व विकासशील देशों से कर रहे हैं, उसका बहुत कम हिस्सा ही विदेशी सहायता के रूप में यहां भेजते हैं। पर माहौल ऐसा बनाया जाता है जैसे वे बहुत बड़ा योगदान दे रहे हों। सहस्राब्दी तथ्यों को भी इसी तरह प्रस्तुत किया गया है जैसे धनी देशों से मिलने वाली सहायता ने बहुत कल्याणकारी कार्य किए हों।

हकीकत यह है कि जो अपेक्षाकृत कम सहायता धनी देशों ने दी है, उसके साथ भी तमाम अनुचित शर्तें जुड़ी रही जो अधिक व्यापक व संतुलित विकास की राह में बाधक बनीं। अतः निर्धन व विकासशील देशों को चाहिए कि वे अपनी जरूरतों के अनुसार जैसा विकास चाहिए इसके बारे में अधिक स्वतंत्र व स्पष्ट सोच आपसी एकता से बनाएं जिससे कोई बाहरी एजेंडा उन पर थोपा न जा सके। भावी विकास का एजेंडा तय करने के लिए गांव व मोहल्ले स्तर पर व्यापक विमर्श होना चाहिए जिसमें सभी लोगों की भागेदारी हो। निर्धन वर्ग व महिलाओं की आवाज को समुचित महत्त्व देने का प्रयास करना चाहिए। विकास के विभिन्न विकल्पों की सही जानकारी गांव व मोहल्ले तक पहुंचनी चाहिए जिससे लोग सही चुनाव कर सकें। इस आधार पर जो एजेंडा निकलेगा वही लोगों का वास्तविक एजेंडा होगा। यह एक ऐसा दौर है जब विकास का मुखौटा पहन कर धनी देश ऐसा एजेंडा फैलाने के चक्कर में हैं जो उनके आर्थिक हितों को तेजी से बढ़ाए। अतः अपने राष्ट्रीय हितों के बारे में इस समय विशेष तौर पर सचेत रहने की जरूरत है।

हाल के समय में देखा गया कि कुछ विकसित देश व वहां के संस्थान कुछ विशेष बीमारियों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जबकि व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य सुधार के प्रयास उपेक्षित हो रहे हैं। उसी समय यह भी देखा गया कि इन देशों की कंपनियां इन रोगों की दवाएं बहुत मोटे मुनाफे पर बेच रही हैं। और इस मुनाफे की रक्षा के लिए पेटेंट कानून में बदलाव के लिए दबाव बना रही हैं। तो इस स्थिति में सवाल उठते हैं कि उनका वास्तविक उद्देश्य क्या है। इस स्थिति में वहां का कोई संस्थान किसी महंगे इलाज को अपनाने के लिए कुछ सहायता दे देता है तो यह मान लिया जाता है कि बहुत बड़ा उपकार किया है, बहुत लोगों का जीवन बचाया है। पर कई बार यह महंगे इलाज को स्वीकृति दिलवाने का उपाय भर होता है जबकि बाद में महंगे इलाज का बोझ निर्धन देशों को स्वयं उठाना होता है। जो थोड़ी बहुत सहायता दी जाती है, वह संभावित मुनाफे से बहुत कम होती है। इसका चालाकी से उपयोग इस तरह किया जाता है कि अधिक महंगी तकनीकों को, अधिक मुनाफे वाली तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपना लिया जाए व इसके लिए महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का समर्थन जुटा लिया जाए। इन सब प्रवृत्तियों का असर यह हो रहा है कि कुछ संकीर्ण तरह के आंकड़ों में चाहे सुधार हो जाए, पर व्यापक स्थितियां नहीं सुधर रही हैं। शार्टकट से कुछ अस्थाई लाभ चाहे मिल जाएं पर दीर्घकालीन स्थिति अधिक चिंताजनक हो रही है। इस तरह की पेचीदगियों को ध्यान में रखते हुए विकास संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे ताकि महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों व जरूरतमंद लोगों के हितों की वास्तव में रक्षा हो सके।
(विविधा फीचर्स से साभार)

Monday, 16 February 2015

ORDINANCE AMENDING THE LAND ACQUISITION AND R&R ACT, 2013: SELL-OUT OR PAYBACK TIME?



Persis Ginwalla[1]
Sagar Rabari[2]

The Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 (RFCTLARR, hereafter referred to as LARR 2013) was the culmination of decades of struggle by people’s movements against arbitrariness, injustice and land grab. It appeared that people’s voice was finally reaching the portals of power. And although the Act did not cede the power of eminent domain in favour of the people, there were, nevertheless, some rather progressive elements there.

Friday, 30 January 2015

जमीन लूट की गारंटी देता भूमि अधिग्रहण अध्यादेश

ग्लैडसन डुंगडुंग



देश में तथाकथित विकास परियोजनाओं के द्वारा विस्थापित लोगों के लिए मुआवजा, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना की मांग को लेकर लम्बे समय से चले जनांदोलनों के बदौलत भारतीय संसद ने किसान, आदिवासी रैयत एवं कृषक मजदूरों को भयभीत करनेवाला अंग्रेजों द्वारा लागू किया गया ‘भूमि अधिग्रहण कानून 1894’‘ को खारिज करते हुए ‘‘भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013’’ पारित किया था। लेकिन दुःखद बात यह है कि नया कानून देश में ठीक से लागू भी नहीं हो पाया था कि केन्द्र की एनडीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के माध्यम से किसान, आदिवासी रैयत एवं परियोजना प्रभावित लोगों के लिए बनाया गया सुरक्षा घेरा पर सीधा हमला करते हुए इसे समाप्त कर दिया है। केन्द्र सरकार ने सामाजिक प्रभाव आॅंकेक्षण, भूमि अधिग्रहण से पहले परियोजना प्रभावित लोगों की सहमति, खाद्य सुरक्षा, सरकारी आॅफसरों को दंडित करना एवं उपयोग रहित जमीन की वापसी जैसे अति महत्वपूर्ण प्रावधानों को ही मूल कानून से दरकिनार कर दिया है, जिससे यह अध्यादेश जमीन लूट की गारंटी को सुनिश्चित करता प्रतीत होता है।

ऐसा लगता है मानो धरती का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश को चलाने वाली सरकार प्रचंड बहुमत के आड़ में ‘लोकतंत्रिक अभाव’ के दौर से गुजर र
ही है। मैं ऐसा इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि जिस तरह से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया, वह लोकतंत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। यह अनुसूचित क्षेत्रों के लिए किये गये संवैधानिक प्रावधानों एवं आदिवासियों के परंपरिक अधिकारों को भी सिरे से खारिज करता है। केन्द्र सरकार का कहना है कि यह अध्यादेश, देश के विकास एवं किसानों के हितों के लिए फायदेमंद साबित होगा। इसलिए हमें इसपर जरूर विचार करना चाहिए कि इसे किसका भला होने वाला है। क्या इस अध्यादेश का मकसद विदेशी पूंजीनिवेश को देश में बढ़ावा देना है या ‘जनहित’ के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपे गये जमीन की रक्षा करनी है? हमें अध्यादेश लाने की प्रक्रिया एवं महत्वपूर्ण संशोधनों पर गौर करना चाहिए।